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कारगिल में शहीद होने वाले पहले मेजर थे अजय प्रसाद, अपने दम पर पाक से छीनी थीं 3 चौकियां

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New Delhi :  कारगिल युद्ध में शहीद हुए सैकड़ों सैनिकों में मध्यप्रदेश के मेजर अजय प्रसाद भी शामिल थे। मेजर अजय प्रसाद उन चुनिंदा सैनिकों में शामिल थे, जिन्होंने कारगिल युद्ध की शुरुआती जंग में दुश्मनों से लोहा लिया था। कारगिल में शहीद होने के पहले मेजर अजय प्रसाद ने श्रीलंका में लिट्टे और मिजोरम में उल्फा उग्रवादियों के भी छक्के छुड़ाए थे।

कारगिल युद्ध की शुरुआत में भारतीय सेना को दुश्मन की ताकत का अंदाजा नहीं था। मेजर अजय प्रसाद ने उन चुनिंदा लोगों में शामिल थे, जिन्होंने भारतीय सेना को बताया था कि लड़ाई आतंकवादियों से नहीं, बल्कि पाकिस्तानी सेना से है। मेजर अजय की टुकड़ी पाकिस्तानी सेना से मुकाबला करते हुए काफी आगे बढ़ गई थी। इसी दौरान उन्हें अहसास हुआ था कि मुकाबला आतंकियों से नहीं, बल्कि पाकिस्तान सेना से है। ऐसे में उन्होंने ग्राउण्ड पर वायुसेना से मदद मांगी।

दुर्गम पहाड़िया और खराब मौसम की वजह से समय पर मदद की परवाह किए बगैर मेजर अजय ने अवंतीपुर में पाकिस्तानी सेना से एक के बाद एक तीन चौकियां छीन लीं, लेकिन दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र होने की वजह से भारतीय वायु सेना की मदद समय पर नहीं मिल सकी और दुश्मनों से लड़ते हुए वे शहीद हो गए।

मेजर अजय प्रसाद के पिता आरएन प्रसाद ने हाल ही में एक मीडिया इंटरव्यू में बताया था कि उनका बहादुर बेटा, ‘1986 में इंडियन मिलिट्री एकेडमी से पास आउट होने के बाद मैकेनाइज्ड इंफेंट्री बटालियन में शामिल हुआ था। दो साल बाद 1988 में उन्हें शांति सेना के साथ श्रीलंंका भेजा गया। सेना के कमांडो और एडवांस कांबेट ट्रेनिंग का हिस्सा रहे मेजर प्रसाद ने फ्रंट पर रहते हुए लिट्टे और अन्य विद्रोहियों के सामने डटकर मुकाबला किया था।

लिट्टे के खिलाफ कार्रवाई में अपनी काबिलियत का लोहा मनवाने वाले मेजर अजय प्रसाद को सेना ने 1992 में एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौपी। उल्फा उग्रवादियों से मिल रही चुनौतियों से निपटने के लिए मेजर प्रसाद की पोस्टिंग मेघालय में की गई। वहां उग्रवादियों से उनकी कई बार मुठभेड़ हो चुकी थी और उग्रवादियों को भारतीय सेना से मात खानी पड़ रही थी। इसका बौखलाकर उग्रवादी संगठनों ने परिवार को निशाना बनाने की धमकी दी, लेकिन इस बहादुर आर्मी अफसर पर इन धमकियों का कोई असर नहीं हुआ और उन्होंने उग्रवादियों से मुठभेड जारी रखी।

सेना जानती थी कि मेजर प्रसाद उग्रवादियों के निशाने पर है। इस वजह से उनकी सुरक्षा पर खास ध्यान रखा जाता था। उनकी जान बचाने के लिए सेना ने उन्हें भेष बदलने का आदेश दे दिया था। छह फीट लंबे मेजर अजय को सरदार बनना पड़ा। इसके लिए उन्हें अपनी दाढ़ी भी बढ़ानी पड़ी। उग्रवादियों को गुमराह करने के लिए आर्मी उनका रिजर्वेशन ट्रेन से कराती थी और भेष बदलवाकर हेलीकॉप्टर या विमान से भेजती थी।